Thursday, March 30, 2017

खुशियां

जीवन की आपाधापी में शायद,
खुशियां बटोरना भूल गए

किसी को अपना बना कर, और
किसी के हो कर भी देखा

किसी के हाथों इस्तेमाल हो कर, और
किसी को खुद इजाज़त दे कर भी

कभी किसी का साथ पा कर, और
कभी किसी को साथ दे कर भी देखा

अपनों का साथ पा कर, और
गैरों के पीछे भाग कर भी देखा

सब कुछ किया,
बहुत कुछ मिला भी

खुशियां भी,
शायद?

समाज

ये ही हमे उठता है और गिरता भी
ये ही हमे बताता ऐसे चलो, वैसे चलो
ये ही हमे बताता तुम्हारी ख़ुशी किसमे है
ये ही कहता की सोचो मत, बस सुनो सबकी,
अपने मन की नहीं
ये ही हमे हर एक दायरे मैं बंधता

ये बंदिशे मनना ज़रूरी है ?
क्यों नहीं हम कहते जो हमारे मन मे है?
क्यों नहीं करते जो हमे सही लगे?
क्यों हैं ये बेड़ियां जिन्हें हम तोड़ते नहीं?
क्यों नहीं हम लेते अपनी ख़ुशी का पक्ष?
क्यों हमारी खुशियां हैं  दूसरो की मोहताज?
क्यों नहीं बनाते हम अपनी ख़ुशी का रास्ता,
खुद?
क्यों?

Sunday, March 26, 2017

उम्मीद

उम्मीद

फिर एक बार
उम्मीद का दामन
थामा था

दामन छूटा, या
उम्मीद ने दम तोडा, ये
हमे समझाए कोई

जानते है हम
ये राह
बहुत कठिन है
इसे ज़रा आसान
बनाये कोई

फिर से
उम्मीद का दामन
थमाए कोई

फिर एक
नयी राह
दिखाए कोई !