Sunday, May 7, 2017

द्वंद

तेरा वादा था भरोसा किसी का
वादा कर, न निभाना, थी फितरत उसकी
उसके हर वादे का भरोसा करना, थी हमारी

कहीं तो किसी के अहम की बात थी
कहीं किसी के आत्मसम्मान की
एक अजीब द्वंद था दोनों में

लो, हो गया फैसला हमारी किस्मत का
न वो आगे बढे
न हमें ही कुछ समझा

और एक बार फिर अहम् ने मार ली बाज़ी
आत्मसम्मान, एक बार फ़िर,
बेबस, लाचार खड़ा रहा



Thursday, March 30, 2017

खुशियां

जीवन की आपाधापी में शायद,
खुशियां बटोरना भूल गए

किसी को अपना बना कर, और
किसी के हो कर भी देखा

किसी के हाथों इस्तेमाल हो कर, और
किसी को खुद इजाज़त दे कर भी

कभी किसी का साथ पा कर, और
कभी किसी को साथ दे कर भी देखा

अपनों का साथ पा कर, और
गैरों के पीछे भाग कर भी देखा

सब कुछ किया,
बहुत कुछ मिला भी

खुशियां भी,
शायद?

समाज

ये ही हमे उठता है और गिरता भी
ये ही हमे बताता ऐसे चलो, वैसे चलो
ये ही हमे बताता तुम्हारी ख़ुशी किसमे है
ये ही कहता की सोचो मत, बस सुनो सबकी,
अपने मन की नहीं
ये ही हमे हर एक दायरे मैं बंधता

ये बंदिशे मनना ज़रूरी है ?
क्यों नहीं हम कहते जो हमारे मन मे है?
क्यों नहीं करते जो हमे सही लगे?
क्यों हैं ये बेड़ियां जिन्हें हम तोड़ते नहीं?
क्यों नहीं हम लेते अपनी ख़ुशी का पक्ष?
क्यों हमारी खुशियां हैं  दूसरो की मोहताज?
क्यों नहीं बनाते हम अपनी ख़ुशी का रास्ता,
खुद?
क्यों?

Sunday, March 26, 2017

उम्मीद

उम्मीद

फिर एक बार
उम्मीद का दामन
थामा था

दामन छूटा, या
उम्मीद ने दम तोडा, ये
हमे समझाए कोई

जानते है हम
ये राह
बहुत कठिन है
इसे ज़रा आसान
बनाये कोई

फिर से
उम्मीद का दामन
थमाए कोई

फिर एक
नयी राह
दिखाए कोई !


Friday, December 4, 2015

दाम

हां, दाम लगाया है मैंने,
अपने रिश्तों का,
अपने सपनो का

चाहा मैंने,
एक गाडी,
एक बंगला,
और, चंद रूपए

मैंने समझा,
सब कुछ मिला गया मुझे,
काहे की कमी!

उसने कहा:
बस, इतना सा दाम है तुम्हारे रिश्तों का?
कितने रुपये में बेचे सपने ?
बस, इतने में ही बिक गया सब कुछ?

तुम्हारी बराबरी न हो सकेगी हमसे,
सब बेच कर अमीर जो हो गए हो तुम!


Saturday, August 29, 2015

वक़्त


वो कहते थे, की
जाने वाले का
ग़म ना कर,
तेरा वक़्त  बदलेगा

मैंने मान लिया

वो कहते थे, की
उम्मीद का दामन
ना छोड़,
अच्छा वक़्त आएगा

मैंने मान लिया

वो कहते थे, की
बस, ये आख़री इम्तिहाँ
और फ़िर देख,
वक़्त का फेर

मैंने मान लिया

किसी ने बताया ही नहीं,
इतने लोग!
इतनी उम्मीदें!
इतने इम्तिहाँ!

कैसे मान लूँ, अब
तो जैसे
मेरा वक़्त,
थम सा गया है !

Friday, August 28, 2015

Aazmaish

Mushkilen aisi hain, jaise
Koi apna kahe,
Tu jahan
Mai wahan

Umeed ki dor to jaise
Tootati jaati hai, aur
Dil ye kahta hai, ki
Bas, ab aur nahi

Ae Khuda, itni
Berukhi kyon?
Mere daaman mai kya
Koi bhi raahat nahi?

Upar dekhti hoon ki
Koi ishara to ho, par
Dhoondla aasmaan aur
Kaale baadal hi to hain,
Bas

Aazmaishon ka daur hai
Dekhen ab kis 'apne' se
Mulakaat hoti hai...

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Kisi ne khoob kaha hai
"Patta patta din pighla,
boota boota raat gali,
jiska jitna daaman tha
utni hi saugaat mili..."